Poetry

अब नहीं छूते स्वर-लहरी
कविता नहीं भाती;
महापुरुषों के कथ्य,
महानता की गाथाए,
फ़ूटी आँख नहीं सुहाती;
जैसे-जैसे बड़ा हो रहा हूं
मेरी इच्छाएं छोटी होती जा रहीं हैं।

चारपाई काश हवा में टीकती
शनिचरे काँटे, नहीं टिकते
बेकांटे वाली घड़ी बनाया करो
समय भी बताया करो
ये बड़ी-बड़ी बातें अब मुझमें नहीं टिकतीं
मेरे लिए जीना ही सब कुछ है
नींद आने पर सोना ही सब कुछ है।

बेवजह कुछ नहीं होता
न ज़मीं न आसमां
न ही बीच का खाली जहाँ;
समय के लिए-
घड़ी चाहिए,
काँटे चाहिए, 
और चाहिए शनिचरापन भी;
मेरे लिए चारपाई
चारपाई के लिए ज़मीं
ज़मीं भी टिकी होती है कहीं-न-कहीं।

मुझे आक्सीजन अगर देगा
बदले में आक्साईड भी लेगा
यही हिसाब आज-कल बिठा रहा हूं
आक्सीजन ज़रूरी है
आक्साईड बना रहा हूँ

कोई टिप्पणी नहीं:

आज के भारतीयों के बीच प्राचीन भारत की दन्त कथाऍं

 आज के भारतीयों के बीच प्राचीन भारत की दन्त कथाएँ जब सिकन्दर भारतीयों से मिला, उसे आश्चर्य हुआ। भारतीयों ने बताया, भारत कितना विशाल है- उतर ...