पास अपने अब कुछ नही रहा
वजह रोने की अपना नही रहा
खुशबू किसी और के नाम हुई
पास तितली के पर नही रहा
वजह रोने की अपना नही रहा
खुशबू किसी और के नाम हुई
पास तितली के पर नही रहा
पत्थर हो कर ऐसे पत्थर हुआ
तराशे जाने का सबब नही रहा
नज़रें क्या मिलीं कि बुझ गयी
पहले-सा झूठ का असर नहीं रहा
लुटने का डर, डर नहीं रहा
बिसात उठ गयी, क़हर नहीं रहा
रात में बेहोशी कैसी घोल दी
सुबह जिक्र-सा कुछ नहीं रहा
तराशे जाने का सबब नही रहा
नज़रें क्या मिलीं कि बुझ गयी
पहले-सा झूठ का असर नहीं रहा
लुटने का डर, डर नहीं रहा
बिसात उठ गयी, क़हर नहीं रहा
रात में बेहोशी कैसी घोल दी
सुबह जिक्र-सा कुछ नहीं रहा
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें