आज के भारतीयों के बीच प्राचीन भारत की दन्त कथाएँ
जब सिकन्दर भारतीयों से मिला, उसे आश्चर्य हुआ। भारतीयों ने बताया, भारत कितना विशाल है- उतर में हिमालय है, दक्षिण में हिन्द महासागर, पूरब और पश्चिम में भी महासागर है।
सिकन्दर सोंच में पड़ गया, क्या अरस्तु को पता है, भारतीय कितने ज्ञानी हैं? आचा्र्यों की बात नहीं कर रहा था. आम जन-सामान्य में इतना ज्ञान।
यहीं सिकन्दर से गलती हो गयी, इसकी कीमत बड़ी था और उसे चुकानी भी पड़ी। उसे अपना विश्वविजय का अभियान छोड़ना पड़ा.। अधूरा , बीच में ही. । उसके सैनिकों ने ना कह दी।
सिकन्दर ने बातों बातों में जन-सामान्य भारतीयों के ज्ञान की विस्तृत विस्तार और गहराई की चर्चा सैनिकों में कर दी-एक पल को तो सब आवाक् रह गए । जव सदमें से उबरे तो एक साथ रोने लगे- कुछ ने सिकन्दर तो कुछ ने सैन्य सरदारों के पैर पकड़ लिए- एक स्वर में बोले-"हम हँसते हँसते जान दे सकते हैं यूनान के लिए , हम लड़ सकते हैं मगर पढ़ नहीं सकते"
2. प्राचीन भारत के गाँव-गाँव में ऑक्सफोर्ड जैसे युनिवर्सिटी थी, सारे ऑक्सफोर्ड -वॉक्सफोर्ड तो हमारे वाले की नकल है। अंग्रेज जलन के मारे जला के ऐसे नष्ट किए कि ्अवशेष तक नहीं मिलते चाहे खोदते हुए धरती के दूसरी ओर ही क्यों न निकल जाओ.
3. क्वॉन्टम कम्पुटिंग जिसमें सब चीजें एक से ज्यादा अवस्था में रहती हैं- हमारे सभ्यता की खोज थी -इसी के लिए तो "दोगला" शब्द आया था-यहाँ भी अंग्रजों ने-खैर जाने दो
4.महाभारत काल के विज्ञान के तो कहने ही क्या ।
हड्प्पा , सिन्धुघाटी, मोहन जोदड़ो की खुदाई में मिला , ज्यामितीय काट वाली सड़कें मगर महाभारत काल की नहीं , मिलतीं तो जब, सड़क की जरुरत जो होती तब.। तब रथ थो, घोड़े थे मगर नहीं था तो रस्ता- काहे की रथ-घोड़े सब जमीन से 6 ईन्च ऊपर हवा में चलते थे। पानी के लिए नल कुएँ की जरुरत ही नहीं- अंगुली दिखाते तो धरती खुद ही फट कर जल धारा उत्पन्न करती -प्यास बुझी, धरती पुन ऐसे जुड़ती जैसे कुछ हआ ही न हो-आज का विज्ञान तो टाँका भी लगाता तो निशान रह जाते