मंगलवार, 12 सितंबर 2017

तीर्थयात्रा: माता-पिता को समर्पित सामाजिक और रचनात्मक गतिविधि




तीर्थयात्रा:

माता-पिता को समर्पित


सामाजिक और रचनात्मक गतिविधि

हम केवल अपने बुजुर्ग परिवार के आशीर्वाद का हिस्सा बनना चाहते हैं, बेशक आप भी बनना चाहेंगे। आशीर्वाद क्या नहीं करती। इसके प्रताप से जीवन के बन्द रास्ते खुल जातें है। तो हम-आप में से कौन ऐसा होगा जो यह मौका गंवाना चाहेगा।

इन्सान दो वक्त खुद को धन्य मानता है, एक जब वह अपने बच्चे को कांधे पे बिठाए सड़क नापता है, दूसरा तब जब उसकी सन्तान तीर्थाटन जैसे जी जोड़ने वाला कार्य करता है। 

हम-आप में से कई ने पाया होगा कि बचत को भले ही ‘फ़सल के कटने’, ‘फ़लों के बिकने’, ‘पहली तारीख’ का इंतजार रहा हो पर डाकघर की रकम खाली होने का, मां के नाक-कान के गहने गायब होने का कोई समय-मियाद नहीं होता था। क्योंकि हमारी जरूरतों-आपदाओं के आने का कोई वक्त नहीं होता था। बाबूजी के जरूरी चीजों के खरीदने की तारीख बदलती रही, मां की हसरतें-शौक फ़ागुन –दर –फ़ागुन होलिका दहन की आग की तरह ठण्डी पड़ती रही। माँ-बाप ढ़लते रहे और हमारे लिए नित नए सूरज खिलते रहे।   

सांता क्लाज आता है रात्रि में सोते बच्चों के सिराहने उनकी खुशियां टाफ़ी, खिलौने रख जाता है। माता-पिता भी तो अपनी ढलती उम्र में बच्चे ही तो है और ख्वाहिशें किनकी नहीं होतीं। तीर्थाट्न को जीवन की सम्पूर्णता माना जाता है। सारे दुनियावी कर्तव्यों के बाद खुद के लिए एक बुजुर्ग और क्या चाहेगा, सिवा इसके कि ईश्वर के धामों की परिक्रमा कर ले और सदगति को प्राप्त करे। आप भी अपने माता-पिता के लिए सांता जरूर बनें।
जब-जब आप के माता पिता तीर्थटन को याद करेंगे, अपनों के बीच अपने भाग्य को सराहेंगे। ऐसा जी जुड़ेगा कि गला भर आएगा, होठ कांपेंगे, आँखे भर आएंगी। क्या करे कोई ये भावना और खुशी कुछ ऐसे अहसासात है जो अकथनीय रूप से व्यक्त हो जातें है। जो इस गली से गुजरा उसी ने जीया। और इसके लिए आपको श्रवण कुमार की तरह अपना जीवन अर्पित नहीं करनी। बस भावना को समझिए, अपने पसीने के कुछ बून्द के साथ समय रहते निर्णय लीजिए।

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