नारों की उठान के बीच की चुप्पी
दिवसों की गर्माहट के बीच का ठण्डापन
और जाने कैसे-कैसे अनमनापन
देख-पढ़ भड़क जाती है तुम्हारी भंगिमाएं;
दिवसों की गर्माहट के बीच का ठण्डापन
और जाने कैसे-कैसे अनमनापन
देख-पढ़ भड़क जाती है तुम्हारी भंगिमाएं;
स्त्री ! तुम्हारे किए क्या होगा
केवल तुम पीड़ित नहीं
समस्या उसकी है
वो स्वपीड़ित हैं ;
केवल तुम पीड़ित नहीं
समस्या उसकी है
वो स्वपीड़ित हैं ;
रंगमंच पर जो पात्र जी रहा
लेने दो वक्त
संवादों के बीच
जी ले पात्रों को,
देख ले अपना अंगसंचालन
कब-कैसे संवाद से बाहर जा रहा
कैसे टुकड़ों में अन्दर आ रहा;
लेने दो वक्त
संवादों के बीच
जी ले पात्रों को,
देख ले अपना अंगसंचालन
कब-कैसे संवाद से बाहर जा रहा
कैसे टुकड़ों में अन्दर आ रहा;
अवकाश में जोड़ेगा सारे टुकड़े
पढ़ेगा अपनी भूख
देखेगा स्वपीड़क अभ्यास
पढ़ेगा अपनी भूख
देखेगा स्वपीड़क अभ्यास
स्त्री! अपने लिए दुआ करो
वो खुद से मुक्त हो जाए।
वो खुद से मुक्त हो जाए।
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