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रविवार, 10 सितंबर 2017

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सबकी अपनी-अपनी प्रतिबद्धता होती है, नैतिक कर्तव्य होते हैं। समाज और आने वाले दिनों के प्रति वचनबद्धता होती है।
इससे प्रेरित हो संवाद करते हैं और जल्द यह संवाद विवाद में बदल जाता है जो पीछे छोड़ जाता है भग्न हृदय, टीस, तीखापन, कड़वाहट्। सब हो जाता है सिवाय उसके जिसके लिए संवाद का आरंभ हुआ था।
इसमें साहित्य जगत, देश, समाज की शांति…सब आते है…अब इसका क्या करें कि जो अपने हैं, जिनसे आपकी पुरानी पहचान है उनसे भी आप दूर हो जाते हैं…तो बताईए कितना भला किया समाज का…अपना, देश का…साहित्य का, पेशे का, संस्थान का…लिस्ट तो लम्बी जाएगी क्युंकि ये वर्गीकरण का आधार है जिसके चश्मे से देखी जाती हैं चीजें

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पहले धर्म का आर्थ धारण करने योग्य अब धर्म का अर्थ धरने योग्य्…ससुरी को कही किसी कोने में धर आओ और चैन से जीओ।
मानव के जीवन पथ पर धर्म-संस्कृति-राष्ट्र ऐसे पड़ाव हैं जो अपने होने के मूल आशय को खोकर खुद मानव को निगलने को आतुर हैं। किसी भी जैविक एपीडेमिक ने इतने नरसंहार न किए होंगे जितने इन मानसिक एपीडिमीक न किए है। हर बार पहले से ज्यादा क्रूरता, बेशर्मी, के साथ अपनी पंजे मानवता के हृदय पर चला रहा। एक लहुलहान हृदय से एक साथ कई पंजे इसके उभर रहे, निकल रहे अपने शिकार की खोज में
किस्से हैं, न किसी की लगाई_बुझाई है
ये इबारत तो तेरे मुंह से टपकते लहू का है

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दर्द की बात चलती है यहां। ऐसा लगता कि मौसम ही दर्दनाक है। प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष यानी दर्द सीधे-सीधे और कभी सांकेतिक रूप से व्यक्त होती है।
व्यक्ति-व्यक्ति की बात है। किसी को जो अतिसाधरण लगती है वही दूसरे को असाधरण प्रतीत होती है। दर्द के साथ भी यही बात है। किसी ने विशिष्ट बना दिया तो किसी के लिए रोजमर्रा की बात्।
वैसे जब दर्द सवारी करता है तब व्यक्त होने के हालात होते कहां। बेहोशी मे होश क्या बेहोश क्या। बाहोश वाले ही बेहोशी की दास्तान कहते पाए जाते हैं।
सन्दर्भ के साये मे ये भी एक तथ्य है कि दर्द के गीत गाने वाले दूसरों को कितना दर्द पहुंचाते इसका कोई आयडिया उनको न ( नो उल्लु बनाविन्ग) होता। कारण बस इतना कि आत्मकेन्द्रित महात्मा होते। तो महात्मन का अभ्यास ही फ़ोकस करना है।
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ऊपर फ़ेंका हुआ पत्थर नीचे आता है। यही बात देश में होने वाली प्रत्येक गतिविधि पर लागू होती है। नागरिक समझने लगे हैं कि जो भी होगा उसका अच्छा बुरा उन्हे हर हाल में जीना होगा। उसका योगदान दोनो तरह से होगा एक जो सक्रिय होकर दिया हो दूसरा निष्क्रिय रह कर किया हो।
यही वजह है कि विभिन्न जनान्दोलन में इनकी सक्रियता बढ़ती जा रही।
पेण्डुलम अपने दो विन्दुओं के बीच दोलन करता है और यही बात प्रत्येक नागरिक की योग्यता पर लागू होती है।
देश के लिए श्र्द्धा अपार है प्रत्येक के मन में मगर योग्य भी तो हों। नतीजा मैदान के अलग-अलग कब्जा जमाए बहेलियों के लिए अवसर बन जाते। अन्तत: एक-दूसरे का सर फ़ोड़ते हुए बहेलिए के जीवन रथ को गति प्रदान करते रहते।
सब को अपनी अक़्ल पर गर्व है लेकिन अकाल के सिवा क्या मिलता है यहाँ

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हमारी व्यवस्था मिश्रित चुनी गयी । निजी क्षेत्र को प्रतीकात्मक रूप से हम साहूकार के रूप में हम जानते रहे हैं। तय हुआ कि इनपर लगाम रखी जाए। इसके लिए लाईसेंस और संतुलन के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की व्यवस्था।
साहूकार तो जो हैं सो है ही पर सार्वजनिक क्षेत्र ने कमाल क़िता। ऐसा कमाल कि विनेवेश की नौबत आ गयी।
सार्वजनिक क्षेत्र में नेता और शीर्ष नौकरशाह लूटते रहे तो कलर्क और सुपरवाईजर स्तर के अपने तरीक़े रहे। मजदूर वर्ग ने एक से ज्यादा यूनियन बनाई और कामचोरी को अंजाम देते रहे। और दबी-कुचली आम जनता कम्पनी के सामान ईट, पथर लोहा-लक़्क़ड़ अपने अपने घर ढ़ोते रहे, कबा।ड बेचते रहे। कूल मिलाकर सब अपनी अपनी औकात और मौके के अनुसार लूट मचाते रहे।
अब रो रहे कि साहूकार यानी अम्बानी अगैरह वगैरह नोच रहे।
जिम्मेदार कौन है…राष्ट्रीय चरित्र्……?

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ईर्ष्या-विश्वास
महात्मा बुद्ध और उनके चचेरे भाइ देवदत्त के बीच कभी न जमी। देव दत्त को ईष्या थी शायद उन्हे लगता होगा कि जो सिद्धार्थ को मिल रहा है वो उन्हे मिलना चाहिए था या फ़िर हम दोनो एक जैसे हैं और जो लोग समझ रहे उन्हे वो पाखण्ड है। सही है कि पृष्ठभूमि एक हो पर जो बुद्ध में आन्तरिक परिवर्तन आए या आन्तरिक यात्रा रही उनकी उसका साक्षातकार तो बाहरी तौर पर देवदत्त कर नहीं सकते थे,
अंगुलीमाल जैसा ह्त्यारा बदल गया पर देवदत्त न बदले… देवदत् और बुद्ध के बीच अतीत की काली छाया थी जबकि अंगुलिमाल और बुद्ध के बीच ऐसी कोई पूर्वकथा न थी। विश्वास नयी भूमि पर उगा।
आप किसी को तभी बदल सकते जब उसका आप पर विश्वास हो 

  

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