कुछ फूल पर, कुछ चाँद पर और कुछ फ़िदा रहते चाँद जैसे मुखड़े पे। कुछ
फ़िदायिन होते जो खुद पर ही फ़िदा रहते। इनके अपने बारे में गलफ़हमी पालने के
इनके फ़न को प्यार से खुशफ़हमी कहे हैं लोग्। कुछ ऐसे ही अज़ीज़ खुशफ़हम इन्सान
हैं अपने सरकार सूरज बाबू।
चचा गालिब के अन्दाज़ में रौबगालिब करने को ताबड़तोड़ अपनी पिटी-पीटाई, लुटी-लुटाई ख्यालात परोस रहे थे सोशल साईट पर्।ऐसे में किसी खातून ने उनके शान में वाह-वाह के कसीदे पढ़ दिए.
मां-बदौलत मियाँ खुश्फ़हम फ़ूल के गुब्बरे हो रहे थे और वाह-वाह के नगीने' अपने कलेजे के कालीन पर जड़ने को उतावले हो रहे थे। तभी खातून ने बड़े मिज़ाज़ से पिन चुभोई…कहा आपके लिखे का मतलब भी ज़रा समझाईये।
uनको तो बस अपने चारो तरफ़ गुब्बरे-ही-गुबारे नज़र आ रहे थे। गुब्बारे जन्मदिन के, जो जो फ़ूलाए ही जाते हैं हवा निकालने को। "सूँ………सूँ…आवाज़ आप तक भी आयी क्या?
चचा गालिब के अन्दाज़ में रौबगालिब करने को ताबड़तोड़ अपनी पिटी-पीटाई, लुटी-लुटाई ख्यालात परोस रहे थे सोशल साईट पर्।ऐसे में किसी खातून ने उनके शान में वाह-वाह के कसीदे पढ़ दिए.
मां-बदौलत मियाँ खुश्फ़हम फ़ूल के गुब्बरे हो रहे थे और वाह-वाह के नगीने' अपने कलेजे के कालीन पर जड़ने को उतावले हो रहे थे। तभी खातून ने बड़े मिज़ाज़ से पिन चुभोई…कहा आपके लिखे का मतलब भी ज़रा समझाईये।
uनको तो बस अपने चारो तरफ़ गुब्बरे-ही-गुबारे नज़र आ रहे थे। गुब्बारे जन्मदिन के, जो जो फ़ूलाए ही जाते हैं हवा निकालने को। "सूँ………सूँ…आवाज़ आप तक भी आयी क्या?
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