अंधेरे कमरों से खुद को बाहर पाए लोग
सूरज को सहसा पा अचकचाए लोग
भीड़ में अपने अजनबीपन पे घबराए लोग
अपने आगे दुनिया को पा गड़बड़ाए लोग
दौड़ पड़ते हैं-
अपने फूले हाथ-पांव को कांधे पे संभालते
खुद पे झुंझलाते, मुंह से कोरस निकालते
दूर दूर
असहज करते हर दर्पण से दूर
बदहवास दौड़ते रक्त से बेहाल नब्ज को थामने।
कब्र के अंधेरे रास आते हैं
हम कहें कमाल मगर
ढूंढने पे आएं
मौत में भी जिन्दगी है
हम रोज ऐसे कब्रिस्तान से गुजरते हैं।
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