देव साकार थे, प्राणहीन थे
सब था, न थी उर्जा।
धरा हरी थी, भरी थी
पटी पड़ी थी
जो लहर सकते थे
जिनसे उठती धुआँ पहुँच सकती थी
देवलोक तक प्राणवायु बन।
ये तब की बात थी
जब सधे नहीं थे हाथ धरा पुत्रों के
न ही अवतारों के कहानियों से कान सुजे थे
तब नहीं आया था हाथ औजार
जो हुमाद को समिधा में बदल दे
न कान पकड़ते ध्वनि को ऐसे
जिह्वा हु-बहु दुहरा सके जैसे
कि पैदा हो आवृति, ध्वनि नाद मंत्रों जैसे।
फिर सीखा धरा पुत्रों ने-
पत्थर से पत्थर घीसना, आग जलाना
औजारों से लकड़ियाँ छीलना
समिधा बनाना, चक्के से दूरी मिटाना
यज्ञवेदी उकेरना, खुद को झुलसाना।
धरापुत्रों के स्वेदकणें के आहुति से
समिधा धधकी, अभ्यासी जीह्वा ने स्वाहा दुहराई
यज्ञ फिर-फिर सम्पन्न किया
ज्यों-ज्यों धरापुत्रों के दम घुटे
त्यों-त्यों देवलोक ने प्राणवायु पायी
और तब देवों के देवत्व ने ली अंगड़ाई
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