घरोंदा रेत का, बच्चा किनारे समुद्र के बनाता, लहर आती और सब बराबर कर जाती। किनारा पहले की तरह साफ हो जाता। उसकी सारी जिन्दगी ऐसे ही कट रही थी। किसी से ठोकर मिलती और वो बेपरवाह-सा दीखता। लोग आलसी की तरह उसकी बेपरवाही को लेते । ठोकरें जब दिमाग पर निशान छोड़़ने लगतीं जैसे कोई आरी एक निशान से लकड़ी को काटता हो। तब वह पहले तो काफी झल्लाता फिर उबरने को कुछ योजना बनाता और उसके अनुसार चलने की कोशिश करता। फिर कुछ नकारात्मक घटता और वह ऐसे बिखर जाता जैसे खुद ही रेत का घरोंदा हो।
उसने लहरों के सामने डटना नहीं सीखा... कि आती लहरों और घरोंदे के बीच खुद खड़ा हो जाए। बस गहरी नींद से जागना-अंगड़ाई लेना फिरसे जागने को नीन्द में खो जाना-कुछ ऐसै ही जीवन कट रही है उसकी।
हर चोट से और निखरता जाए, ऐसा हो जाए। हर ठोकर के साथ खुद को और ज्यादा अपने योजना पर खुद को झोंक दे- काश जान पाए कि बाँध बधने तक सैलाब बार-बार आता रहेगा और वो ऐसे ही अपना सब गंवाता रहेगा।
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