शनिवार, 21 मार्च 2026

अपवित्र पवित्रता

 पढ़े लिखे , ज़हीन लोग, सम्भ्रान्त लोग भेद-भाव करते हैं-नशेड़ी-गंजेड़ी नहीं करते। क्या अपना क्या पराया-इनके लिए सब अपने; हम निवाला , हम प्याला, अपनी धुन में हम, सारा जग लगे निराला।
अफीम की पिनक, गांजे का धुआँ और सारे मसले जिन्दगी के रफा-दफा । तो मार्कस कार्ल ने कहा धर्म अफीम है मगर एक जो कहने की हिम्मत ना जुटा पाए कि कुनबा परस्ती भी सस्ता गाँजा का नशा ही है जिसका सफर घर-परिवार-देश है। क्या होता अगर कह पाते कि देश भक्ति आगे चलकर एक संगठित अपराध का कवच बनेगा।

लोग शहरबदर होते-देश बदर होते , कई तरह के अनिश्चितता के बाद अपनी नयी जड़ नयी भूमि -नये लोग के बीच जमा पाते। ये उनकी कहानी है जो कर पाते, इनसे कई गुणे वो लोग हैं जो खप जाते और उनकी कहानी ही नहीं बनती। तो जो पहले से रह रहे लोग जिनको मूल निवासी की भी संज्ञा दी जाती है , जलने लगते हैं-उनको लगता है कि उनका हक़ था जो ये प्रवासी ले रहे। वो आसान रास्ता चुनते हैं पहचान का, और गोलबन्द हो कर टूट पड़ते हैं- संघर्ष व्यक्तिगत यात्रा है जो गिने-चुने की ही यात्रा होती है । ये अपराध है मगर सामूहिक पहचान के साथ की गई घृणित प्रयास जिसके लिए एक पवित्र लिफाफा चुनते जिसके उपर लिखा होता है एकता-देशभक्ति।
देशभक्ति ने सिपाहियों के परिवारों को दिया असमय मौत, उनके परिवार पर अनिश्चतता के बादल जिसकी बौछार में सारे सुखद भ विष्य के बुने सपने बह जाते। जनता को मिलते बमों से छत-विछत घरों के मलबे और कुछ  मृत अपने, नेताओं को असीम दमनकारी शक्तियाँ और निरंकुशता, व्यापारियों को अकूत धन बनाने के मौके, अधिकारियों को व्यापारियों की कमाई में उनका अवैध हिस्सा। तो इसमें अफीम कहाँ है, कहाँ है गाँजे का धुआँ- जनता का युद्धोन्मादी होना-जीत के गीत गाना-हार का मातम मनाना, अपने नेताओं को आदमी से भगवान बनाना और न देख पाना कि सारे कवायद का शिकार सिर्फ वही है- सारे षड़यंत्र दरअसल उसी की पेराई से उसका तेल निकाल कर नेता-व्यापारी-अधिकारी अपने जिस्म पर मालिश करते कि दंड-बैठक से वे और भी माँसल लगें।

         

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